Most dangerous top 5 Ghost story in Hindi

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Top 5 Ghost story in Hindi

Most dangerous top 5 Ghost story in Hindi

Ghost story in Hindi

बालुबा कन्याशाला में भेडिये पिशाच का हमला (Hindi Ghost Story No-1)

मेरा नाम जल्पा मोनाणी है | मेरे पिता अनाज और बीज बेचते हैं | आज में उस घटना के बारे में बताने जा रही हूँ जिस वजह से मेरी बहन बरबाद हो गयी | मुझे याद है, हम दोनों बहने 11वि कक्षा में बालुबा कन्याशाला में पढ़ती थीं | हम दोनों जुड़वाँ बहनें होने के कारण हमेशा लोगों में चर्चा का विषय बनी रहती थीं | एक दिन करीब 11 बजे हमारी छुट्टी हो गयी | हम दोनों बहनें स्कूल के कम्पाउंड में थीं तभी मेरी बहन भावना बाथरूम गई | करीब 15 मिनट हुए लेकिन वह वापिस नहीं लौटी | तब मुझे चिंता हुई | मैं पता लगाने बाथरूम की और गई | वहां का नज़ारा देख कर मेरी रूह काँप गयी |

मैंने देखा भावना वाश-बेसन की दीवार से सट कर बैठी थी | उसके सिर से खून बह रहा था | और कोई अजीब सी पहाड़ी आकृति उसके सिर से बहता खून चूस रही था | एक पल मैं स्तब्ध हो कर वह नज़ारा देखती रही फ़िर मेरी दर्दनाक चीख निकल गयी | तब पियोन और कुछ टीचर्स वहां दौड़ आये | मैं तुरंत उन्हें उस घटना के बारे में बताने लगी | लेकिन उस वक्त तक वहां मेरी बहन भावना के अलावा कोई नहीं था | वह गुमसुम सी बैठी थी | सब नें उसे पुछा की, आखिर वहां हुआ क्या था? लेकिन वह कुछ भी नहीं बोली |

वहां पर आये हुए सब लोगों नें पहले तो भावना के फिसल जाने का तर्क निकला और उसके बाद उन्होंने उल्टा मुझे ही कसूरवार बताना शुरू कर दिया | उन्हें लगता था, शायद हम दोनों बहनों में मारपीट-जगडा हुआ होगा, उसी वजह से भावना को चोट लगी होगी |

उसके बाद, हम दोनों बहनें स्कूल से घर लौटी तो, माँ-पापा नें भी उसे खूब पुछा लेकिन भावना जैसे दूसरी दुनियां में ही जी रही थी | देर रात को भी वह बार बार उठ कर घर के बाहर बैठ जाती | स्कूल में भी उसका बरताव अजीब हो गया था | टीचर्स कुछ भी कहे तो वह पढाई नहीं करती | उल्टा उन्हें घूरती रहती | एक बार, क्लास में भावना अकेली बैठी थी | मैंने सोचा उस से बात करूँ | मैं कैंटीन से कुछ नाश्ता ले कर उसके पास जाने लगी | मैंने देखा भावना खिड़की के बहार देख कर हँसे जा रही थी | और अपने होठ बडबडा रही थी |

अब मेरी धडकनें बढ़ चुकी थी | मैंने डरते डरते उसके पीछे जा कर खिड़की की और नज़र घुमाई तो मुझे वही रहस्यमई आकृतिनुमा इन्सान दूर खड़ा दिखा, जो बाथरूम में भावना के सिर के घाव से खून चूस रहा था | वह डरावना नज़ारा देख कर मेरे हाथ से नाश्ता वहीँ गिर गया | तभी फ़ौरन भावना मेरी और मुड़ी | उसके चेहरे पर बेहद गुस्सा था | उसने दौड़ कर मुझे बाल से पकड़ लिया | अगले ही पल मैं ज़मीन पर थी | आप यकीं नहीं करेंगे “भावना नें उस दिन मुझे चेहरे पर तीन बार काटा

थोड़ी ही देर में और स्टूडेंट्स वहां आ गए | उन्होंने भावना को मुझसे अलग किया | मेरी जो बहन पानी भी मुझसे पूछ कर पीती थी वह, अब मुझसे खुनी भेडिये की तरह बरताव कर रही थी | अब स्कूल प्रसाशन को यकीं हो गया था की, बाथरूम वाली घटना भी हम दोनों बहनों की ही लड़ाई थी | उन्होंने उसी वक्त मेरे पापा को भावना के काटने के निशान दिखाये | बात बड़ी साफ़ थी | वह लोग नहीं चाहते थे की हम दोनों एक स्कूल में रहें | पापा नें उसी वक्त भावना को हॉस्टल भेजने का निर्णय लिया |

मैंने उन्हें और स्कूल प्रशासन को खूब समझाया लेकिन मेरी हकीकत पर किसी को विश्वास नहीं था | चूँकि उस शैतानी पिशाच के बारे में भावना कुछ बोलने को तैयार नहीं थी | इस घटना के बाद भावना 3 साल हॉस्टल में रही | एक दिन, हमें रात को करीब तीन बझे उसके हॉस्टल से फोन आया | भावना बाथरूम के पास बेहोश पड़ी मिली थी | हम उसे घर लाये | उसके सिर पर ठीक वैसे ही घाव थे, जो स्कूल के समय मैंने देखे थे |  आज भी भावना अँधेरे में अकेले बडबड़ाती रहती है | हमेशा अँधेरे में रहना पसंद करती है | शायद हमारी स्कूल के वक्त से मेरी बहन पर पिशाच का वास है | पता नहीं उसका क्या होगा | मैं इस घटना की बात सार्वजनिक इस लिए बता रहीं हूँ ताकि मेरी बहन को इस मुसीबत से बाहर लाने का कोई सुझाव मिल सके – जल्पा मोनाणी

This story source :- Indian ghost story

वो भयानक रात (Hindi horror story No-2)

Hindi ghost story 2020

७ फरवरी १९८५ को हमने पूजा का पहला जन्मदिन मनाया। दो सप्ताह के भीतर कलकत्ता में मुझे अपने जहाज़ “विश्व आशा” ज्वाइन करना पड़ा । इस बार मेरी पत्नी मंजू और बेटी पूजा भी मेरे साथ थे। लगभग १० दिनों के बाद हमारा जहाज़ कोचीन पहुंचा। वहां रहने के दौरान, हमें डॉक्टर से मिलना पड़ा क्योंकि मंजू को ठीक नहीं लग रहा था, चेक अप के बाद डॉक्टर ने बताया कि मंजू गर्भवती थी और हमें सेलिंग के दौरान बहुत सावधानी बरतनी होगी। इस खबर से हम दोनों ही खुश थे और थोड़े से चिंतित भी । सबसे पहले तो पूजा केवल १५ महीने की थी और फिर जहाज़ लगभग ४ महीने की लंबी यात्रा पर रसिया जा रहा था। खैर, हमने इसे हमारी नियति मानकर, ईश्वर के आशीर्वाद के रूप में स्वीकार कर लिया।

लगभग २१ दिनों की सेलिंग के बाद, अप्रैल के अंत में हम ओडेसा पहुंचे। मौसम और दरिया दोनों ही ने हमारा साथ दिया, दिनचर्या बहुत अच्छी रही, जहाज़ पर हमारे बंगाली स्टुअर्ड ने मंजू और पूजा के खानपान की अच्छी देखभाल की। रसिया में हमारा जहाज़ लगभग ३ महीने रहा, इस बीच हमने कई नयी जगह, रसियन सर्कस और विशेष रूप से ओडेसा के ओपेरा हाउस में बैले नृत्य देखा। इस अवधि का हम तीनों ने खूब आनंद लिया। कोचीन से कारगो में तम्बाकू लोड कर जहाज़ ओडेसा आया था, ओडेसा में तम्बाकू अनलोड कर जहाज़ नोवोरोसिस्क चला गया। ये भी काला सागर में ही रसिया का दूसरा बंदरगाह है, यहाँ से कलकत्ता के लिये भारी मशीनरी का सामान लोड किया।

दिनांक २७ जुलाई १९८५, नोवोरोसिस्क (रसिया) – कारगो लोडिंग का सारा काम ख़त्म कर कलकत्ता की वापसी यात्रा के लिए जहाज़ शाम को निकल गया, हमेशा की तरह मैं अपनी ४ से ८ की वाच ख़त्म कर सवा आठ बजे अपने केबिन में आया। मंजू सोफे पर बैठी एक स्वेटर बुन रही थी और पूजा टेबल टेनिस की बाल से खेल रही थी, मैंने फ्रिज से एक ठंडी कोक निकाली और पास ही एक कुर्सी पर बैठ गया। इतने में ही चीफ इंजिनियर का फोन आया, आज काला सागर का मिज़ाज खराब है, इंजन रूम में लाशिंग वगैरह देख लेना।

मैंने अपना फोन नीचे रखा ही था, इतने में जहाज़ का एक ज़ोरदार रोल आया, मेरा केबिन जहाज़ की पोर्ट साइड के बाहरी कोने पर था । वहां पर रोलिंग का असर ज्यादा ही महसूस होता था, अचानक पूरा जहाज़ पोर्ट से स्टाबोर्ड की तरफ गया और फिर सीधा हो गया। टेबल पर रखी कोक की कैन धड़ाम से नीचे गिरी और सारी कोक फ्लोर पर फ़ैल गई, मंजू ने सबसे पहले पूजा को उठाकर अपने साथ सोफे पर बिठाया और पकड़ लिया। मैंने सोचा, अभी अभी तो नोवोरोसिस्क से निकले हैं, इतनी जल्दी तो काला सागर का रौद्र रूप नहीं मिलना चाहिये, शायद एक दो रोल आकर शांत हो जाएगा ।

मगर ऐसा नहीं था, उस दिन काला सागर का मिज़ाज ज्यादा ही खराब था। स्टाबोर्ड की तरफ पहले रोल के बाद जहाज़ पोर्ट की तरफ गया और ये बार बार होने लगा । ५ मिनिट में ही ये रोल ३० से ३५ डिग्री तक जा रहे थे, अचानक से हालत बहुत बिगड़ गई थी। रोलिंग के साथ पिचिंग भी शुरू हो गई थी, मुझे जल्दी से जल्दी इंजन रूम में पहुंचाना था और यहाँ इस हालत में मंजू और पूजा को डे रूम में नहीं छोड़ सकता था। उन दोनों का अपने आपसे बेड रूम में घुसना बहुत मुश्किल लग रहा था। जहाज़ पर ऐसी स्थिति के लिये हमेशा पूरी तैयारी रहती है, फिर भी कभी २ चूक हो जाती है और ये बहुत भारी पड़ती है। मेरे डे रूम में भी ऐसा ही कुछ हुआ, हर रोल के साथ रेक में रखा सामान फ्लोर पर गिर रहा था। आम तौर पर रेक में रेकगार्ड लगाकर रखते हैं, लेकिन उस दिन कुछ रेकगार्ड नहीं लगे थे, रेक में रखी फाइलें गिर गई। एक अचार की शीशी रखी थी, नीचे गिरी और सारा अचार फ़ैल गया। जहाज़ के रोल धीरे धीरे बढ़ते जा रहे थे और अधिक कष्टप्रद हो रहे थे ।

फ्लोर पर तेल और कोक फैलने की वजह से पूरी फ्लोर चिकनी हो गयी थी, इतने में ही रोल के साथ साथ, कुर्सी पर बैठा मैं, खिसककर पहले स्टाबोर्ड की तरफ जाकर टकराया और फिर पोर्ट से टकराया। चलना तो दूर, बिना सहारे कुर्सी से खड़ा होना मुश्किल हो गया था। इस स्थिति से हम दोनों ही घबरा गए थे, हमारी चिंता का मुख्य कारण मंजू का गर्भ से होना था। किसी तरह मैंने टेबल का सहारा लिया और बड़ी मुश्किल से खड़ा हुआ, सबसे पहले मैंने पूजा को टेबल पर खड़ा कर एक हाथ से जकड़ा, और फिर दूसरे हाथ से मंजू को बेड रूम की तरफ धकेला। उसके पीछे २ पूजा को गोद में लेकर मैं भी बेड रूम में घुस गया, दोनों को अन्दर सुरक्षित छोड़, मैं फिर बाहर आया। डे रूम की हालत बद से बदतर होती जा रही थी, लगातार तेज़ रोलिंग से फ्रिज का होल्डिंग गार्ड ढीला हो गया और फ्रिज स्टाबोर्ड से खिसककर पोर्ट से टकराया और फिर पोर्ट से स्टाबोर्ड, डे रूम में तबाही मची हुई थी।

बचते बचाते बड़ी मुश्किल से डे रूम से बाहर निकला और इंजन रूम पहुंचा, पहुँचकर वहां के हालात का जायजा लिया। मेन इंजन के सम्प में लुब्रिकेटिंग आइल का लेवल बढ़ाया, सारे सामान की लाशिंग वगैरह देखी ईश्वर की कृपा से इंजन सही सलामत चल रहा था, जरूरी निर्देश देकर आधा घंटे बाद मैं अपने केबिन में लौटा । काला सागर ने करीब १२ घंटे तक सबकी नींद उडाये रखी, रात बड़ी मुश्किल से गुज़री । सुबह तक सागर कुछ शांत हो गया था, जो इस्तानबुल पहुँचते २ पूरा शांत हो गया ।- Yogesh Suhagwati Goyal

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Real Hindi Ghost story

ज़िंदा लाश की असली कहानी / Scary Stories in Hindi – डरावनी हिंदी कहानीयाँ | New Ghost Stories in Hindi 2020, भूत की हिंदी में कहानियाँ | (Hindi ghost story No-3)

Hindi Ghost story 2020

 

पच्चीस वर्षीय अनुज अपने उस फ्लैट में पहली बार आया, जो उसे उसकी कम्पनी ने सुविधा के रूप में दिया था।

वास्तव में अनुज की नई-नई नौकरी लगी थी। वह हरियाणा में अपना परिवार छोड़कर शिमला में आ गया था।

सालभर से नौकरी की तलाश में भटक रहे अनुज को अच्छी नौकरी मिलते ही उसका उदास जीवन खुशियों से खेलने लगा था।

कम्पनी ने सुविधा के रूप में उसे जो फ्लैट दिया था, उस फ्लैट में प्रवेश करते ही अनुज के होठों से अनायास ही निकला था-

“वाओ, मोस्ट ब्यूटीफुल फ्लैट!” Scary Stories in Hindi

वह भीतरी दरो-दीवार तथा फ्लैट में मौजूद हर एक सामान को देखने के बाद बहुत प्रसन्न हुआ था।

उसके चेहरे पर नौकरी मिल जाने की सुनहरी चमक तो पहले से ही उत्पन्न थी, मगर अब कम्पनी की ओर से रहने की सुख-सुविधा देखने के बाद उसका चेहरा खुशी से खिल गया था।

अपने जरूरी सामान से भरा बैग उसने कन्धे से उतारकर नीचे फर्श पर छोड़ा तथा लम्बे डग भरकर सामने पड़े सोफे पर जा बैठा।

सोफे पर बैठते ही उसने सुकून महसूस करने जैसे अन्दाज में आंखों को बन्द करते हुए हलक से गहरी सांस छोड़ी । फिर चन्द लम्हों बाद अनुज फ्रेश होने के लिए बाथरूम की ओर प्रसन्न मुद्रा में गुनगुनाता हुआ बढ़ा। इतना ही नहीं उसके थिरकते कदम उसकी गुनगुनाहट पर खुशी का इजहार स्पष्ट कर रहे थे।

वह झूमता थिरकता वॉश रूम में पहुंच गया।

बाथरूम में भीतर पहुंच अनुज ने सामने लगे आइने पर नजर डाली और एक शानदार स्टाइल में वह स्वयं को देखकर मुस्कुराया।

फिर जल्द ही वह स्नान की तैयारी के साथ अपने काम में जुट गया ।

स्नान से निपटने के बाद जब उसने दोबारा खुद को आइने में देखने के लिए नजर उठाई तो चौंक गया।

एकाएक उसके चेहरे से उलझन प्रकट हुई। आंखों में प्रश्न उभरा।

क्योंकि इस बार आइना देखते हुए अनुज ने देखा था कि एक साथ कई दरारें आइने पर पड़ी हुई हैं।

आइने पर पड़ी दरारें कुछ इस प्रकार थीं मानो किसी ने आइने के बीच में जोर से पत्थर मारकर उसे चटकाया हो।

मगर अनुज ने ऐसी कोई आवाज न सुनी थी, जिससे वह यह अनुमान कर सकता हो कि आइना पत्थर मारने पर ही चटका है।

कुछ देर पूर्व उसने आइने को अपने सही रूप में देखा था, मगर अब आइना बुरी तरह दरारों से भरा उसकी आंखों के सामने था।

अनुज समझ नहीं पाया था कि आखिर आइने में दरारें पड़ीं किस प्रकार? वह उलझ बैठा था इस रहस्य में।

आइने में पड़ी दरारें उसके स्नान के दौरान ही आई थीं। वह लगातार सोच रहा था कि आखिर इस बीच ऐसा क्या हुआ जिसके कारणवश आइने में दरारें पड़ गईं?

लाख सोचने के बाद भी उसकी समझ में कुछ नहीं आया तो वह इसी उलझन में फंसा रहकर बाथरूम से बाहर निकल आया।

रात ग्यारह बजे। Scary Stories in Hindi

अनुज अपने बेड पर लेटा एक हॉरर स्टोरी पढ़ रहा था। उसके फ्लैट में गहरी खामोशी छाई थी। एकांत में वह पूरे आनन्द के साथ हॉरर स्टोरी का आनन्द उठा रहा था।

स्टोरी पढ़ते-पढ़ते उसे काफी रात बीत गई थी। उसने सो जाने के इरादे से सामने लगी वॉल क्लॉक की तरफ दृष्टि उठाई।

क्योंकि सुबह छ: बजे उसे अपनी ड्यूटी पर जाने के लिए उठना था।

अनुज ने जैसे ही वॉल क्लॉक की ओर देखा उसी समय दीवार पर लगी घड़ी अपनी मजबूती छोड़ते हुए नीचे फर्श पर गिरी ‘छन्न’ की आवाज के साथ घड़ी का शीशा टूट गया।

अनुज तुरन्त बैड से उठा और उसने आगे बढ़कर घड़ी उठाई वॉल क्लॉक पूरी तरह खराब हो चली थी।

जैसे-तैसे उसने फर्श पर बिखरा घड़ी का कांच समेटकर डस्टबिन में डाला और बापस अपने शयनकक्ष में आ गया।

जब वह वापस अपने शयनकक्ष में आया तो उसने देखा कि उसके सारे कपड़े फर्श पर फैले पड़े हैं।

यह देख वो बुरी तरह चौंका। उसने झट अनुमान लगा लिया कि अवश्य ही कोई उसके फ्लैट में घुस आया है कोई चोर!

अपने फ्लैट में किसी चोर के घुस आने का अनुमान करते हुए उसने गुर्राहट भरे स्वर में पुकारा

‘कौन है यहां?’   Scary Stories in Hindi

साथ ही वह पूरी वीरता के साथ चोर का मुकाबला करने के लिए खड़ा रहा।

जवाब के रूप में कुछ कदमों की गूंज उसने सुनीं यह समझते अनुज को अधिक समय न लगा कि कोई व्यक्ति उसके फ्लैट से भाग निकलने की कोशिश कर रहा है। क्योंकि फ्लैट में गूंज रहे कदमों की आवाजें फ्लैट से बाहर की ओर जाती सुनाई दे रही थीं।

अधीर कदमों के साथ अनुज उसी तरफ बढ़ा, जहां उसे कदमों के गूंजने की आवाजें होने का अन्देशा हो रहा था वह फुर्तीले कदमों के साथ आगे पहुंचा, तो उसने देखा कि फ्लैट का डोर खुला हुआ है।

दरवाजा खुला जानकर अनुज को आश्चर्य हुआ। क्योंकि वह तो दरवाजा लॉक करके सोने की तैयारी के साथ बैड पर गया था, मगर अब दरवाजा खुला देखने के बाद वह आश्चर्यचकित था।

दरवाजा कैसे खुला या किसने खोला, इन प्रश्नों के उत्तर सोचने का समय नहीं था उसके पास। दिमाग में सावन की घटा की तरह घुमड़ उठे प्रश्नों को ज्यों का त्यो वह अपने दिमाग में छोड़े रखकर फुर्ती से आगे बढ़ा।

फ्लैट से निकल अनुज ने बाहर की ओर नजरें दौड़ाई।

परन्तु बाहर उसे कोई नजर न आया। साथ ही वातावरण की शान्ति को महसूस करते हुए ऐसा तनिक भी आभास न होता था कि कुछ देर पूर्व वहां कोई आया-गया भी है।

हर तरफ गहरी खामोशी पैर पसारे सोती महसूस हो रही थी।

अनुज उलझन भरे भाव चेहरे से व्यक्त करता वापस अपने फ्लैट में चला आयां ।

मगर फ्लैट का दरवाजा खुला जानने के बाद उसके मन में कौंध उठे प्रश्न बराबर जोर मार रहे थे। वो अभी तक थमे नहीं थे। तूफानी रफ्तार के साथ अपनी रवानगी में आकर बराबर अनुज को चिन्तित कर रहे थे।

धीमे-धीमे कदमों के साथ अपने बैडरूम की ओर बढ़ रहे अनुज ने मन ही मन कहा-

“कहीं ऐसा तो नहीं कि दरवाजा मुझ ही से खुला रह गया हो?”

मन में ऐसा कहते हुए अनुज सोचपूर्ण मुद्रा अपनाये एक स्थान पर ठिठक गया था।

फिर अगले ही क्षण अनुज के मनमस्तिष्क ने उससे पूछा-

“पर वे कदमों की आवाजें कैसी थीं, जो अभी-अभी सुनी गईं?”

फिर अगले ही पल उसे लगा कि हो सकता है रात के इस खामोश माहौल में उसके कान बजे होंगे। क्योंकि बिखरे कपड़ों को देखकर उसने सोचा था कि शायद उसके फ्लैट में कोई चोर घुस आया है, तो इसी विचार के रहते उसे खामखाह ऐसा लगा हो कि कोई चोरी छिपे उसके फ्लैट से निकलकर गया है।

मन-मस्तिष्क में उभरते सारे सवालों और जवाबों को उसने वहीं खत्म कर अपने फ्लैट का दरवाजा बन्द किया और लाइट ऑफ करके बैड पर आ गया।

आधी रात बीत चुकी थी। Scary Stories in Hindi

फ्लैट में अजीब-सी गन्ध फैल जाने के कारण अनुज की आंख खुल गई।

बैड से उठकर उसने सारी लाइटें ऑन कीं तथा इधर-उधर नजरें दौड़ाते हुए यह जानने का प्रयास करने लगा कि आखिर गन्ध कहां से तथा क्यों आ रही है?

इसी तलाश में वह फ्लैट का चप्पाचप्पा छान मारकर अन्त में स्नानघर की ओर बढ़ा।

जब वह स्नानघर में पहुंचा तो बुरी तरह शॉक्ड रह गया। उसकी आंखों में ही नहीं, बल्कि चेहरे पर भी खौफ के असीमित भाव उत्पन्न हो गये थे।

अनुज अपने स्थान पर खड़ा पत्थर की मूर्ति बन गया था। उसका दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। किन्तु दिमाग सन्नाटे में आकर सांयसांय करने लगा था ।

क्योंकि स्नानघर के बीचों बीच खून में सनी एक लड़की की लाश पड़ी थी। लाश का जिस्म सही सलामत था, मगर उसका चेहरा खून से पूरी तरह सना हुआ था।

लाश को देखते हुए इस बात का भली प्रकार आभास होता था कि उसके सर पर वार करके ही उसकी हत्या की गई है।

SCARY STORIES IN HINDI

लाश के चेहरे पर छाया खून सूखी पपड़ी बन गयी थी। इससे यह अनुमान लगाया जा सकता था कि उसकी हत्या हुए बहुत वक्त बीत चुका है।

लाश को अपने बाथरूम में देखते हुए भयभीत अनुज की समझ में तनिक भी न आया कि यह लाश किस प्रकार उसके स्नानघर में आ गई ?

अनुज का तो जैसे पूरा दिमाग ही खराब हो चला था। उसकी समझ में कुछ भी न आ रहा था।

कुछ देर के बाद मानो वह गहरी गफलत से जागा तो उसे ख्याल आया कि वह फौरन इस घटना के बारे में पुलिस को बताये।

मन में यह विचार आते ही वह वापस अपने शयनकक्ष में पलट गया।

बैड पर रखा उसने अपना मोबाइल उठाया और झट पुलिस स्टेशन का नम्बर मिलाना शुरू किया।

इससे पहले कि वह पूरा नम्बर डायल कर पाता, किसी ने मधुर स्वर में उसे पुकारा इस मधुर स्वर को सुनते ही वह तत्काल पीछे पलट गया।

पलटकर उसने देखा कि उसकी आंखों के सामने वही लड़की खड़ी है जिसे एक लाश के रूप में देखते हुए वह अपने बाथरूम में छोड़ कर आया था।

लड़की अपने उसी रूप में थी, जिसमें अनुज ने उसे बाथरूम में देखा था।

उसे देखकर अनुज बुरी तरह डर गया। सब कुछ भूलकर उसने लड़की से भयभीत स्वर में पूछा-

“कौन हो तुम?” Scary Stories in Hindi

वह युवती चेहरे से बड़े ही खौफनाक भाव व्यक्त करते हुए बोली-

“में एक लाश हूं। वही लाश जिसे अभी कुछ देर पहले तुमने अपने बाथरूम में देखा था।”

“वो तो मैं भी जानता हूं।’ अनुज कंपित स्वर में बोला-“मगर तुम जिन्दा कैसे हो गई?”

“तुम्हें लाश बनानेके लिए!” युवती का स्वर आतंकित था।

अनुज को अब यह समझने में वक्त न लगा कि उसके सामने खड़ी जिन्दा लाश वास्तव में भूत है।

अनुज सम्भलकर बोला-

“मगर तुम मुझे क्यों लाश बनाना चाहती हो? आखिर मेरा कुसूर क्या है?”

“तुम्हारा कुसूर सिर्फ इतना ही है कि तुम इस फ्लैट में आकर ठहरे हो। मैंने तुम्हें इस फ्लैट से निकल जाने के लिए कई इशारे दिये। पहले तुम्हारे स्नानघर के आइने में दरारें डालीं फिर तुम्हारी वॉल क्लॉक तोड़ दी। फिर उसके बाद तुम्हारा कपड़ों से भरा बैग खाली कर तुम्हारे कपड़े निकालकर फेंक दिये फिर तुम्हारे फ्लैट का दरवाजा खोल दिया ताकि तुम पेश आईं इन छोटी-छोटी घटनाओं से डरकर भाग जाओ। मगर तुम बहुत निडर निकले। इसलिए अब मैं तुम्हें किसी भी कीमत पर जिन्दा नहीं छोड़ सकती।”

“‘मगर तुम मुझे इस फ्लैट से क्यों निकालना चाहती हो?”

“क्योंकि इसी फ्लैट में दो आदमियों ने मिलकर मुझे मार डाला था। उसी दिन से मैं इस फ्लैट में रहती हूं।”

“पर ऐसा तुम्हारे साथ क्यों हुआ? उन दोनों आदमियों ने तुम्हारा मर्डर क्यों किया?” अनुज ने पूछा।

“क्योंकि वो दोनों मुझे उठा लाये थे। इस फ्लैट में लाकर उन्होंने मेरा बलात्कार किया था। फिर उसके बाद मेरा कत्ल कर दिया था। तब से उनकी प्रतीक्षा में मैं यहां रहती हूं। एक दिन वो दोनों यहां जरूर आयेंगे और मैं उन्हें अपने हाथों से खत्म कर दूगी। इसके लिए इस फ्लैट का खाली रहना बहुत आवश्यक है।”

“ठीक है, तो मैं यह फ्लैट छोड़कर अभी चला जाता हूं।” अनुज ने पूर्ववत् स्वर में कहा।

‘नहीं।’ वह आदेशात्मक स्वर में बोली-‘अब इस फ्लैट से तुम्हारी लाश ही जायेगी। क्योंकि तुम मेरी हकीकत जान गये हो। लिहाजा तुम्हें जिन्दा छोड़कर मैं जमाने के लिए चर्चा का विषय नहीं बनना चाहती। वरना मेरा मकसद अधूरा रह जायेगा।”

‘मुझ पर भरोसा करो।’ अनुज पीछे हटता हुआ बोला-“मैं तुम्हारा राज राज ही रखूंगा। मैं तुम्हारे बारे में किसी से कुछ नहीं बताऊंगा। मेरा यकीन मानो। मुझे जाने दो।’ अनुज गिड़गिड़ाने लगा।

“तुम जिन्दा यहां से नहीं लौट सकते।” युवती ने कहा।

“मुझे जाने दो।” कहते हुए अनुज इस हद तक पीछे हटा कि अब और पीछे नहीं जा सकता था। यानि उसकी कमर दीवार से सट गई थी।

लड़की डरावना भाव चेहरे पर लिये उसकी ओर कदम उठाने लगी। अनुज का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। आंखों के सामने उसे अपनी मौत नाचती नजर आने लगी। अपने बचाव का उसके पास कोई रास्ता तो रह ही नहीं गया था।

वह किसी भी कीमत पर मरना नहीं चाहता था, मगर उसके न चाहने पर भी उसकी मौत निरंतर उसकी ओर बढ़ रही थी।

अनुज हर पल इस सोच में था कि किसी सूरत से कोई बचाव का रास्ता सामने आ जाये तो तत्काल स्वयं को इस बेवक्त की मौत से बचा ले। लेकिन उसके सामने सिवाय उसकी मौत के और कुछ भी न था।

मौत हर क्षण उसे अपनी आगोश में भर लेने के इरादे से उससे निकटता बढ़ा रही थी।

जब वह जिन्दा हुई लाश उससे केवल चार कदम के फासले पर रह गई तो अचानक अनुज का स्वर उभरा। वह बोला-

“ठहर जाओ! मैं मरने से पहले अपने मुंह में गंगाजल की कुछ बूंदें डालना चाहता …।’’

वह युवती ठहर गई। बोली-

‘‘ठीक है।” 

तभी अनुज गंगाजल लेने आगे बढ़ा। वह गंगाजल लेकर वापतयुवती के पास चला आया। वहां आते ही अनुज ने सारा गंगाजल उस लड़की पर उंडेल दिया, जो मरकर भी जीवित थी।

गंगाजल उस पर गिरते ही उसमें आग लग गई। वह प्रेत आत्मा चीखती-चिल्लाती रही आग उसमें चारों तरफ से लगी थी।

अनुज इस दृश्य को देखता रहा। जल्द ही वो जिन्दा हुई लाश जलकर राख हो गई। शरीर भस्म होते ही उसकी आत्मा रोशनी बनकर खिड़की से निकली और आकाश की तरफ चली गई।

भस्म हुए शरीर की सारी राख खुद-ब-खुद वहां से गायब हो गई।

उस वक्तअनुज ने राहत की गहरी सांस हलक से छोड़ी।

This story source:- lok Hindi

प्रेत का डर (Hindi Ghost story 2020, No-4 )

Hindi horror story 2020
कुमराली गांव में जय सिंह नाम के एक जमींदार रहते थे, जिनके पांच बेटे और एक बेटी थी। इकलौती बेटी होने के कारण उसे सबसे ज़्यादा दुलार भी मिला। जमींदार की बेटी ज्योति, अपने पिता के इस दुलार की वज़ह से हठी और गुस्सैल स्वभाव की हो गई। इसके अलावा वो आलसी भी थी। एक दिन जमींदार की पत्नी ने उससे कहा, ‘बेटी तो पराया धन होती है, तुम इसे इतना सिर न चढ़ाओ। विवाह के बाद कैसे निभाएगी?’ ‘मैं इसके ससुराल दास-दासियां भिजवा दूंगा।’ जमींदार ने कहा। कुमराली के पास एक गांव में एक गरीब किसान रहता था। उसके बेटे का नाम था वीरभान। वीरभान के जन्म के समय ही उसकी माता की मृत्यु हो गई थी। वीरभान को किसान ने ही पाल-पोस कर बड़ा किया था। महामारी में किसान का बैल मर गया। दूसरा बैल खरीदने के लिए उसे जय सिंह से पैसे उधार लेने पड़े। वर्षा न होने से फसल भी न हुई। लगातार ब्याज से किसान का ऋणभार बढ़ता रहा। पिता-पुत्र इसी चिन्ता में डूबे रहते। समय के साथ Êामींदार की बेटी ज्योति भी बड़ी हो गई। Êामींदार को उसके विवाह की चिन्ता हुई। ज्योति से विवाह करने के लिए कोई भी युवक तैयार नहीं हो रहा था। तभी जमींदार को वीरभान का ख्याल आया। वीरभान सुन्दर होने के साथ बुद्धिमान भी है। इसके अलावा किसान उनका कर्Êादार भी है, सो इस रिश्ते के लिए वो मना भी नहीं करेगा। धन के प्रभाव से ज्योति को खुश भी रखेगा, यही सोच कर जमींदार ने किसान के यहां विवाह प्रस्ताव भेजा। न चाहते हुए भी वीरभान को यह शादी करनी पड़ी। ससुराल में भी ज्योति का व्यवहार नहीं बदला। पति के साथ ससुर को भी फटकार देती थी। किसान जमींदार के भय की वज़ह से कुछ न बोलता था। वीरभान गंभीर और स्वाभिमानी युवक था। कुछ दिन तक तो वो चुपचाप अपने पिता का ये अपमान देखता रहा, क्योंकि वो ज्योति की शिकायत करता भी तो किससे? एक दिन वीरभान ने अपने पिता के कान में कुछ कहा। पुत्र की बात सुन पिता ने भी स्वीकृति में गरदन हिला दी। अगले दिन वीरभान ने चुपके से सभी दास-दासियों को जमींदार के घर वापस भेज दिया। उसने कहा, ‘अपने घर की जिम्मेदारी स्वयं निभानी चाहिए।’ ज्योति जब सोकर उठी तो उसे बहुत Êाोर से भूख लगी। वीरभान ने कहा, ‘खाना बना लो।’ ज्योति रुआंसी होकर कहने लगी,‘इस कड़ाके की ठंड में मुझसे खाना नहीं बनेगा।’ ‘कोई बात नहीं, खाना मैं बना लूंगा। बस रसोई में तुम मेरी थोड़ी मदद कर देना।’ वीरभान बोला। अब वीरभान की बात मानने के अलावा ज्योति के पास कोई चारा नहीं था। दोनों ने मिलकर खाना बनाया। वीरभान खाने के बाद बोला, ‘मैं खेत पर जा रहा हूं काम करने, तुम घर में चौकस रहना।’ ‘चौकस क्यों?’ ज्योति ने पूछा। वीरभान ने बताया, ‘दिन मे प्रेत यहां से गुÊारते हैं और जो भी उनकी तरफ देखता है, वो उसे नोंच डालते हैं।’ ज्योति डर गई। ‘नहीं, नहीं! तब तो मैं यहां नहीं रहूंगी।’ एकाएक उसके मुंह से निकला। वीरभान ने पूछा, ‘तो तुम मेरे साथ खेत चलोगी?’ ज्योति बोली,‘मैं इस ठंड में बाहर नहीं जा सकती। एक बात बताओ ये प्रेत तुम्हारे सामने क्यों नहीं आते?’ वीरभान ने कहा,‘मेरे सामने भी आते हैं। पर जो उनकी तरफ देखता है, प्रेत उसी को चोट पहुंचाते हैं। यदि हम अपने काम में लगे रहंे, तो प्रेत सामने से गुÊार जाएंगे और हमें पता भी नहीं चलेगा। अच्छा, अब मैं जा रहा हूं।’ इतना कहकर वीरभान खेतों की ओर चल दिया। घर में खाली बैठी ज्योति को डर लगने लगा। उसने सोचा, ‘मुझे काम करते रहना चाहिए, इससे प्रेत की नÊार मुझ पर नहीं जाएगी।’ इच्छा के विपरीत वो काम करती रही। वह डर से खाली भी नहीं बैठ सकती थी। उसने मन में सोचा,‘वीरभान के आने से पहले क्यों न खाना ही बना लिया जाए।’ उस रात का खाना ज्योति ने बना लिया। वीरभान जब घर आया तो देखा, पूरा घर साफ होने के साथ-साथ रात का खाना भी बन गया है। ये देखकर वो बहुत ही खुश हुआ। ज्योति ने बताया,‘आज प्रेत नहीं आए, मैं काम में जुटी रही।’ ‘शायद वो बगल से निकल गए होंगे।’ वीरभान ने उत्तर दिया। इसके बाद तो ये दिनचर्या बन गई। किसान और वीरभान खेत में काम करते और ज्योति प्रेत के डर से घर का सारा काम करती। उसका स्वभाव बदल गया। दो महीने गुÊार गए। एक दिन जमींदार अपनी पत्नी के संग ज्योति से मिलने आए। ज्योति को देख वो दंग रह गए, वो भाग-भागकर घर का काम कर रही है। उसके शरीर में बिलकुल भी आलस नहीं था। माता-पिता को देखकर ज्योति उनके गले से लिपट गई। फिर बोली,‘पिता जी हमारे यहां कुछ काम करिए।’ उसने अपनी मां से भी यही कहा। उसे डर था कि प्रेत कहीं माता-पिता को नुकसान न पहुंचा दे। जमींदार को बेटी की बात माननी पड़ी, वो आंगन में रखे भूसे को घर में रखने लगे। शाम को जब वीरभान और उसके पिता खेत से लौटे, तो दोनों अचंभित खड़े देखते रह गए।। किसान ने जमींदार से क्षमा मांगी। जमींदार बोला, ‘मुझे तो कुछ समझ में नहीं आ रहा है। घर में घुसते ही ज्योति ने मुझे काम में लग जाने को कहा।’ वीरभान कुछ बोलता इससे पहले ही ज्योति बोल पड़ी,‘यदि आप काम नहीं करते तो प्रेत आपको हानि पहुंचा सकते थे।’ ‘प्रेत?’ जमींदार की पत्नी ने पूछा। ‘हां-हां, यहां से प्रेत गुÊारते हैं!’ ज्योति बोली। जमींदार ने वीरभान से कहा,‘मुझे अच्छा नहीं लगता, मेरी बेटी इतना काम करे, तुमने नौकरों को क्यों लौटाया?’ वीरभान ने उत्तर दिया,‘विवाह के बाद लड़की पर उसके पति का अधिकार होता है, पिता का नहीं। जब हम स्वयं इतनी मेहनत करते हैं, तो इसका भी कर्तव्य बनता है, कि ये भी हमारा साथ दे, और ऋण चुकाने में हमारी मदद करे।’ जमींदार बोला ‘पर वो ऋण तो मैंने ज्योति के विवाह के समय ही माफ कर दिया था।’ वीरभान ने कहा,‘मैं आपके पैसे अवश्य ही लौटाऊंगा। हमें दूसरों पर आश्रित नहीं रहना चाहिए।’ जमींदार की पत्नी ने पूछा,‘बेटा वे प्रेत कौन-से हैं, जिनकी बात ज्योति कर रही है?’ वीरभान बोला,‘माताजी, पहला प्रेत है आलस्य! यदि ज्योति आलस कर बैठी रहती, तो इसे आलस्य का प्रेत नोंच डालता। दूसरा प्रेत है आपका ये ऋण! जब तक मनुष्य अपना ऋण न चुका दे उसे चैन नहीं आता।’ वीरभान की बातें सुनकर जमींदार प्रसन्न हुए। उसकी पत्नी बोली,‘बेटा, तुमने मेरी बेटी का उद्धार कर दिया। अब मुझे इसकी कोई चिन्ता नहीं।’ अब ज्योति को भी असली प्रेतों की पहचान हो गई थी। उसने वीरभान से कहा,‘अब हम दूसरों पर कभी आश्रित नहीं रहेंगे।’ इसके बाद तीनों ने मेहनत करके जमींदार का ऋण भी चुका दिया। साभार:- सीपियां (सी बी टी प्रकाशन)
This Story source:- Dainik Bhaskar

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